Breaking News
Home / Chandigarh / तीन दिवसीय 42वां वार्षिक चंडीगढ़ संगीत सम्मेलन का शुभारंभ शहर में

तीन दिवसीय 42वां वार्षिक चंडीगढ़ संगीत सम्मेलन का शुभारंभ शहर में

*पहले दिन गायकों की कर्णप्रिय गायन से मंत्र मुग्ध हुए श्रोतागण
*2 नवम्बर को सायं 6:00 बजे चंद्रिमा मजूमदार सरोद वादन तथा रघुनंदन पणशीकर अपना गायन प्रस्तुत करेंगे


चंडीगढ़ 1 नवम्बर 2019: 
इंडियन नेशनल थियेटर द्वारा दुर्गा दास फाउंडेशन के सहयोग से तीन दिवसीय 42वां वार्षिक चंडीगढ़ संगीत सम्मेलन आज से स्ट्रोबरी फील्डस हाई स्कूल, सैक्टर 26 के ऑडिटोरियम में शुरू हो गया है। तीन दिवसीय इस 42वां संगीत सम्मेलन के पहले दिन एक ओर जहां प्रतिभाशाली गायिका सावनी मुदगल ने अपना गायन प्रस्तुत कर श्रोताओं से खूब प्रशंसा बटौरी, वहीं दूसरी ओर रवींद्र परचुरे ने अपने गायन से उपस्थित दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

Advertisements

संगीतकारों के परिवार में जन्मी, सावनी पद्मश्री मधुप मुद्गल की बेटी हैं, और 12 साल की उम्र से उनसे कठोर प्रशिक्षण प्राप्त किया है। वह ब्राजील के साओ पाउलो में 18 महीने तक चलने वाले एक सांस्कृतिक कार्यक्रम सामवेद का एक अभिन्न हिस्सा रही हैं। वर्तमान में वह दिल्ली के गंधर्व महाविद्यालय में शास्त्रीय संगीत पढ़ाती हैं।

सावनी ने  अपनी प्रस्तुति में राग श्याम कल्याण में  रूपक ताल में निबद्ध बहुत ही सुंदर बंदिश से आरम्भ किया जिसके बोल थे ‘म्हारा रसिया’। इसके पश्चात उन्होंने एक अत्यंत सुंदर व दुर्लभ टप्प ख्याल राग शहाना में  ‘दिलदार मुस्तफा’ बखूबी प्रस्तुत किया। जिसके पश्चात  उन्होंने राग गारा में एक दादरा  प्रस्तुत किया ‘ऐरी आन बान’ और श्रोताओं से खूब प्रशंसा बटोरी।

रवींद्र परचुरे ने अपने गायन का आरंभ राग भोपाली से किया। जिसके बोल थे ‘जब मैं जानी तिहारी बात’ गया जो कि विलंबित ख्याल तिलवाड़ा ताल में निबद्ध था। जिसके पश्चात उन्होंने अपने गुरु पंडित अरुण कशलकर द्वारा रचित द्रुत ख्याल में ‘जा रे भवँरा जा’ बखूबी प्रस्तुत किया। उन्होंने इसी राग में तीन ताल में निबद्ध एक तराना श्रोताओं के समक्ष भी पेश किया।

परचुरे ने अपनी प्रस्तुति को आगे बढ़ते हुए राग हमीर में ‘सुरजन सो मिला दे’ जो कि तीन ताल में निबद्ध था, को बढिय़ा ढंग से सुनाया। जिसके बाद उन्होंने द्रुत एक ताल में ‘तिनदेरे कारण मिनदेरे यार’ को सुनाया जो कि द्रुतताल में निबद्ध था। उन्होंने राग खमाज में एक बहुत ही सुंदर बंदिश की ठुमरी सुनाई जिसके बोल थे ‘कोयलिया कूक सुनावे’। उन्होंने  अपने गायन का समापन राग भैरवी में ‘काने कीनी मौसे बरजोरी’  से किया जो कि अधा तीन ताल में निबद्ध था।

रवींद्र परचुरे को 4 साल की उम्र से संगीत में उनके पिता स्वर्गीय श्रीपद  परचुरे  द्वारा शामिल किया गया था जिसके बाद उन्होंने उज्जैन में स्वर्गीय श्री अप्पासाहेब फडक़े के तहत अपना संगीत प्रशिक्षण जारी रखा। उनको स्वर्गीय मनोहर भागवत जी से भी ग्वालियर घराने की बारीकियों का प्रशिक्षण मिला। जिसके उपरांत उन्होंने ग्वालियर-आगरा के प्रसिद्ध गायक पंडित अरुण काशलकर  जी से मार्गदर्शन प्राप्त किया।
Advertisements

About Hindxpress News

Check Also

गठबन्धन सरकार में जाटों का दबदबा, वैश्य समुदाय को जगह नहीं

चंडीगढ,15नवम्बर। हरियाणा की भाजपा-जजपा गठबन्धन सरकार में इस बार जाटों का दबदबा है। जहां उपमुख्यमंत्री …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Show Buttons
Hide Buttons